भाजपा की कूटनीतिक सियासत की पूरी सच्चाई,एक सच्चा देशवासी होने के नाते आपको यह जरूर जानना चाहिए

BY- ASHUTOSH TRIPATHI

भाजपा और दक्षिण भारत के कुछ क्षेत्रीय राजनीतिक दलों को छोड़ दे तो लगभग हर राजनीतिक दल ने अनुसूचित जातियों  अनुसूचित जनजातियों पिछड़ा वर्ग तथा मुस्लिम और ईसाई समाज को अपने वोट बैंक के रूप में प्रयोग किया है.

 इससे निश्चय ही सवर्ण हिंदुओं में रोष था और वह भारत वर्ष में स्वयं को उपेक्षित मान रहे थे. भाजपा ने हालांकि घोषित रूप से कभी भी अनुसूचित जातियों अनुसूचित जनजातियों अथवा पिछड़े वर्ग को हिंदू समाज से बाहर नहीं माना, लेकिन  इसकी बहुत संख्या सवर्ण  हिंदुओं की है व्यापारी वर्ग और सवर्ण हिंदू भाजपा के वोट बैंक रहे हैं. और राम मंदिर का मुद्दा उठाकर भाजपा इसी वर्ग की भावनाओं को पोषित करती रही है. यही कारण है कि हिंदू समाज उम्मीद लगाए बैठा है , कि भाजपा सत्ता में आई तो धारा 370 समाप्त होगी मुस्लिम समाज का तुष्टिकरण बंद होगा राम मंदिर बनेगा और आरक्षण हटेगा जी हां हिंदू समाज के इस वर्ग को यह भरोसा था कि आरक्षण भी हटेगा।


 यह चुनाव का वर्ष है भाजपा फूंक-फूंक कर कदम रख रही है वह अपना हर मोहरा ठीक से चलाना चाहती है। धर्म विकास सब चुनावी बातें हैं मुद्दा यह है कि अधिक से अधिक लोगों को खासकर समाज के संगठित वर्गों को अपना  वोट बैंक कैसे बनाया जाए.
 उत्तर प्रदेश में हालिया चुनाव की हार से  मोदी-शाह ने बड़ा सबक लिया है. पिछड़ा वर्ग और मुस्लिम समाज के गठजोड़ ने मोदी की हर तिकड़म को पटकनी  दे दी  और मुख्यमंत्री तथा उपमुख्यमंत्री के चुनाव क्षेत्र में भी भाजपा को धूल चाटनी पड़ी. यह सिर्फ हार नहीं थी घोर अपमान भी था परंतु मोदी शाह की जोड़ी राजनीतिज्ञ ही नहीं बेहद  कूटनीतिक भी है दोनों ने समझ लिया कि मायावती अखिलेश के गठजोड़ ने  ही उनकी हवा निकाल दी.

 अब तो सभी विपक्ष दल एक हो गए हैं राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री पद का दावा तक छोड़ने का इशारा दे दिया है. ममता बनर्जी सब को एक झंडे तले लाने के लिए प्रयासरत हैं और अरविंद केजरीवाल को इस गठबंधन में शामिल किया जा सकता है. ऐसे में यह आवश्यक था कि दलित-मुस्लिम गठजोड़ को तोड़ा जाए सन 2011 की जनगणना के अनुसार देश में अनुसूचित जातियों की जनसंख्या 16.6 प्रतिशत अनुसूचित जनजातियों की जनसंख्या 8.7 और मंडल आयोग के अनुसार अन्य पिछड़ा वर्ग की जनसंख्या 52% है  इस प्रकार देश का हर चौथा नागरिक यानि की  कुल जनसंख्या का 24% भाग दलित की श्रेणी में आ जाते हैं.
मुस्लिम समाज की जनसंख्या 18.2 प्रतिशत है दलित-मुस्लिम गठजोड़ 40% मतदाताओं का ऐसा सघन संगठन है जो भाजपा को हराने के लिए काफी है. मोदी शाह की चिंता यहीं से शुरू होती है. भाजपा के हालिया तीनों फैसले इसी चिंता का प्रमाण है. भाजपा ने एससी एसटी एक्ट को तथा  सिटी पेंशन एक्ट को फिर से मूल स्वरूप में लाने के लिए कानून बनाने की घोषणा की है यह एक विशेष कानून है जिसमें भारतीय दंड संहिता यानी आईपीसी के मुताबिक अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के खिलाफ जाति के आधार पर होने वाले अपराधों में तत्काल मुकदमा दायर होना और तत्काल गिरफ्तारी तथा अग्रिम जमानत के निषेध का प्रावधान है.


 सर्वोच्च न्यायालय ने इसी वर्ष 20 मार्च को इन तीनों प्रावधानों को निरस्त कर दिया था लेकिन अब संविधान में संशोधन करके सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को पलट दिया जाएगा। आरक्षण को लेकर हिंदुओं में रोष तो था ही, परन्तु प्रमोशन में भी आरक्षण तो इस वर्ग की बर्दाश्त से ही बाहर था, लेकिन अब सरकार सर्वोच्च न्यायालय में प्रमोशन में आरक्षण
की वकालत कर रही है.



 मोदी सरकार ने इससे संबंधित संविधान के अनुच्छेद 16 की वकालत का निर्णय लिया है एससी एसटी एक्ट को सिटी प्रिवेंशन एक्ट तथा प्रमोशन में आरक्षण के साथ मोदी सरकार का तीसरा बड़ा कदम राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा देने का है.

 सरकार ने संसद में यह कानून पास करवा लिया है अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति आयोग संविधान के तहत बने थे लेकिन पिछड़ा वर्ग आयोग संविधान के तहत ना होकर एक सरकारी आदेश से घटित हुआ था इसे सिर्फ पिछड़ी जातियों की सूची बनाने और सुधारने के लिए सिफारिश करने का अधिकार था.

 नया आयोग पिछड़े वर्ग के विकास के लिए भी उपाय सुझाएंगा उनके विकास पर नजर रखेगा और इन जातियों की शिकायतों की सुनवाई भी करेगा मायावती और अखिलेश यादव के एक साथ आ जाने से दलित-मुस्लिम गठजोड़ ने विशाल आकार ले लिया था और भाजपा को हार का अपमान सहना पड़ा था.


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 भाजपा जानबूझकर मुस्लिम एवं ईसाई समाज से दूर रहना चाहती है क्योंकि इससे हिंदुओं को संतोष रहता है कि भाजपा उनकी अपनी पार्टी है यदि हिंदुओं में से दलित छिटक जाएं और मुस्लिम समाज के साथ जा मिले तो वोट बैंक की सेंध भाजपा को हराने के लिए काफी है.

 मुस्लिम समाज की नाराजगी से भाजपा को लाभ होता है लेकिन दलित समाज के भी नाराज होकर उनके साथ जा मिलने से भाजपा के वोट बैंक का एक बड़ा हिस्सा ही टूट जाता है. भाजपा यह खतरा दोबारा मोल नहीं लेना चाहती इसलिए मोदी शाह ने सवर्णों की नाराजगी का खतरा मोल ले कर भी दलितों को खुश करने का प्रयास किया है.



 उन्हें विश्वास है कि वह सवर्ण हिंदुओं को मना लेंगे क्योंकि विपक्ष में एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं है जो हिंदुओं का एक छत्र नेता बन सके.  हिंदू युवा सीधे माने जाते हैं तथा जल्दी मान जाते हैं उन्हें मनाना आसान है इसलिए इतना सा जोखिम लेना जरूरी था, क्योंकि यह खतरे की हदों को पार नहीं करता इसके विपरीत मुस्लिम समाज का विरोध भाजपा के लिए लाभप्रद है, क्योंकि इससे हिंदुओं का गठजोड़ पक्का होता है.

 पिछले कई महीनों से भाजपा खुद मोदी जी ने भी विकास की बात नहीं की है और वह खुद समझ चुके हैं कि उनके विकास की हवा पहले ही निकल चुकी है लगभग हर भाजपा मुख्यमंत्री के खिलाफ एंटी इनकंबेंसी फैक्टर था जो अभी जारी है हिंदू एकता के बिना वोट नहीं मिल सकते और हिंदुओं की जनसंख्या वाले समाज में दलितों का प्रतिशत कितना ऊंचा है कि उसकी उपेक्षा संभव नहीं है.

यही कारण है कि मोदी शाह की जोड़ी ने यह जोखिम लिया है यह  सोशल मीडिया पर सवर्ण हिंदुओं की नाराजगी को खतरा नहीं मानते।

 हिंदू समाज को कुछ महापुरुषों की जयंती फोटो मूर्ति और प्रतीकों से भी संतुष्ट किया जा सकता है तो फिर ज्यादा प्रयत्न की क्या आवश्यकता है.
 वोटों की खातिर अब मोदी मंडलीकृत हो गए हैं और विकास गया भाड़ में....

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