जानिए सभी राजनीतिक दलों की स्वार्थी राजनीति का सच

राजग (राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन )  और संप्रग ( संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन ) दोनों ही नए दलों को अपने साथ जोड़ने की कोशिश में जुट गए यह चुनावी संघर्ष से पूर्व का परिदृश्य प्रस्तुत करता है जो स्वरूप अब तक बना है वह अंतिम नहीं है ऐसा भी लग रहा है कि जो दल पिछले लोकसभा के चुनाव में राजग के साथ थे वह इस बार संप्रग के साथ जाते दिख रहे हैं। 

चुनाव के दौरान पाला बदलना कुछ नया नहीं है परंतु इस बार गणित थोड़ी अलग दिख रही है यह खेल चुनाव की प्रक्रिया शुरू हो जाने तक चलता रहेगा तेलंगाना में तो सब कुछ रहस्यमई नाटक जैसा दृश्य दिखाई पड़ रहा है कर्नाटक में जैसे ही कांग्रेस और जनता दल के गठजोड़ की सरकार बनी तो जिन 16 दलों के प्रतिनिधि बेंगलुरु पहुंचे थे उनमें तेलंगाना के मुख्यमंत्री और तेलंगाना राज्य समिति के अध्यक्ष चंद्रशेखर राव सबसे आगे थे किंतु कांग्रेस किसी भी सूरत में राव को अपने गठबंधन में लेने को तैयार नहीं है कारण दिलचस्प है। यह कारन इस तथ्य को स्पष्ट कर देना चाहता है कि आज देश की राजनीति में राजनीतिक दल विचारधारा के आधार पर या नीति कार्यक्रम के आधार पर एकजुट नहीं है और दूसरे यह भी कि स्वार्थों का टकराव होने पर कोई किसी को भी धोखा देने को तैयार है। 

 आंध्र प्रदेश का बंटवारा कर जब तेलंगाना बनाने की बात आई तो आंध्र में कांग्रेस की सरकार थी और आंध्र के कांग्रेसी मुख्यमंत्री भी आंध्र के बंटवारे के विरोधी थे इन परिस्थितियों में चंद्रशेखर राव ने तेलंगाना में कांग्रेस के साथ गठबंधन का भरोसा कांग्रेसी नेताओं को दिलाया था चुनाव घोषित होते ही राव ने कांग्रेस से गठबंधन तोड़ दिया और कांग्रेस ना आंध्र में जीत पाई और न ही तेलंगाना में। अब तेलंगाना में कांग्रेस चंद्रशेखर राव से बदला लेना चाहती है और उसने तेलंगाना में तेलगुदेशम एवं अन्य दलों के साथ गठबंधन कर लिया है देखना यह है कि क्या राजग तेलंगाना राज्य समिति को अपने पाले में खींच लाता है या दोनों अलग-अलग चुनाव लड़ते हैं बिहार में भी राजग का स्वरुप बदल रहा है। जो पिछली लोकसभा के दौरान गठबंधन का स्वरुप था वह इस बार नहीं होगा पिछले चुनाव में नीतीश के नेतृत्व वाला जदयू अलग चुनाव लड़ रहा था।  इस बार पहले की तरह जदयू राजग में लौटा आया है किंतु लोकसभा की सीटों को लेकर तीखी खींचतान रही है। 

 इसका कारण यह बताया जा रहा है कि विधानसभा में जदयू की सीटें अधिक है किंतु लोकसभा में भाजपा और लोजपा की सीटें अधिक हैं एक पहल इस विवाद को सुलझाने के लिए भाजपा की ओर से हुई है जिसके अनुसार भाजपा 20 सीटों पर ही चुनाव लड़ेगी यानी वह अपनी जीती हुई दो सीटें जदयू को छोड़ रही है जनता दल के पास वर्तमान लोकसभा में मात्र 2 सीटें ही हैं किंतु राजग में पूरे 13 सीटें मिल रही हैं यदि यह बंटवारा अंतिम हो जाता है तो राजग बिहार में राजग युवा कांग्रेस के गठबंधन से लड़ने की स्थिति में हो जाएगा इस बार कांग्रेस नेतृत्व मायावती और बसपा को संपर्क गठबंधन के साथ जोड़ने में पूरी ताकत से लगी है। 

 भाजपा के मुख्यमंत्री वाले तीन राज्य राजस्थान मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में विधानसभाओं के चुनाव कुछ माह बाद ही होने जा रहे हैं इन तीनों ही राज्यों में कांग्रेस ने बसपा के साथ सीट के बंटवारे की पहल की है और यह फार्मूला अंतिम चरण में दिख रहा है यदि ऐसा हो जाता है तो कांग्रेस बसपा और संप्रग तीनों ही भारी लाभ की स्थिति में रहेंगे जहां तक उत्तर प्रदेश की बात है सपाबसपा और कांग्रेस के बीच लोकसभा के सीटों के बंटवारे की बात काफी आगे बढ़ चुकी है 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा उत्तर प्रदेश की 80 में से 73 सीटें जीत ली थी उत्तर प्रदेश की जीत से ही राजा के केंद्र में सरकार बनाने में सफल रहा उत्तर प्रदेश राजग और शब्द दोनों के लिए समान रूप से महत्वपूर्ण होगा सपा बसपा और कांग्रेस के गठजोड़ का समीकरण भारी असर डालेगा इस बात को भाजपा भी समझ रही है इसलिए भाजपा अति पिछड़ों और दलितों का कार्ड भी खेल रही है। 

 इतना तो स्पष्ट है कि पिछली बार की तरह उत्तर प्रदेश में स्थिति भाजपा के लिए एकतरफा नहीं रहेगी गुजरात को लेकर कांग्रेस और भाजपा दोनों ही चिंतित हैं विधानसभा के विगत चुनाव में कांग्रेस ने अपनी ताकत बढ़ाई थी और भाजपा की सीटें सत्ता मिलने के बाद भी कम हो गई दलित नेता जिग्नेश मेवाड़ी और हार्दिक पटेल विधानसभा की ही तरह लोकसभा चुनाव में भी भाजपा के विरोध में प्रचार करने का ऐलान कर चुके हैं पाटीदार नेता हार्दिक पटेल अनशन पर थे विधानसभा चुनाव में हार्दिक पटेल ने कोई अपना अलग दल नहीं बनाया था दक्षिण भारत में तमिलनाडु में भी महत्वपूर्ण गतिविधियां चल रही हैं। 

 कांग्रेस नेतृत्व डीएमके के नए नेता एमके स्टालिन के संपर्क में हैं क्योंकि यहां अन्नाद्रमुक सत्ता में है इसलिए उसी दल के साथ गठबंधन करना चाहेंगे जो सत्ताधारी दल का विरोधी हो अन्नाद्रमुक कांग्रेस और भाजपा दोनों के संपर्क में है भाजपा नेतृत्व तमिलनाडु में हवा का रुख देख रहा है और जिस दल के साथ गठबंधन लाभकर होगा वह उसी की कोशिश करेगा विगत विधानसभा चुनाव में द्रमुक और अन्नाद्रमुक ने किसी भी राष्ट्रीय दल से चुनाव नहीं लड़ा था लेकिन आने वाले लोकसभा चुनाव में क्या होगा।

पश्चिमबंगालमें ममता बेनर्जी की सरकार है इसमें सभी को दिलचस्बी स्वभाविक होगी पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेसकी  सरकार है। विगत 5 वर्षों में बंगाल में भाजपा की शक्ति बढ़ रही है इसलिए ममता भी भाजपा का पुरजोर विरोध कर रही है।  तृणमूल कांग्रेसकी वाम मोर्चे  के साथ समझौते की संभावना नहीं के बराबर है कोई गठबंधनहोगा तो वह तृणमूल कांग्रेस  और कांग्रेस के बीचहोगा। महाराष्ट्र में कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस के बीच गठबंधन लगभग तय हो चुका है पिछली विधानसभा में कांग्रेस राष्ट्रवादी कांग्रेस भाजपा और शिवसेना अलग-अलग थे भाजपा के शिवसेना से रिश्ते काफी तीखे चल रहे हैं भाजपा अपने व्यापक हितों को देखते हुए शिवसेना से गठबंधन चाहेगी किंतु इसकी कोई पहल होती अब तक दिखाई नहीं पड़ रही है.

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