जानिए कौन लाया था भारत में भ्रस्टाचार से लिप्त राजनीती

राजनीति एक संपूर्ण व्यवस्था कहलाती है जिसका मूल्य उद्देश्य लोकहित होता है और जिसकी सफलता जनता की खुशहाली पर निर्भर करती है राजनीति में जनता एक सेवक का चुनाव करती है ऐसा सेवन से नेता कहा जाता है जो जनता की हर समस्या से परिचित हो उसके और जनता के मध्य कोई राज ना हो पारदर्शिता इस व्यवस्था का एक मूल अंग होता है जब शासक अपने सहयोगियों के हर कार्य और राज से परिचित होता है तो वह सफल रहता है। 

लेकिन यह सभी बातें सिर्फ परिभाषित करने मात्र ही हैं जिसका आज हकीकत से कोई वास्ता नहीं है आज किसी भी नेता के लिए राजनीति का मतलब चुनाव जीतकर सत्ता की कुर्सी तक पहुंचना है और फिर 5 साल तक जितना हो सके जनता के पैसों से अपना हित करना है आज के नेता सेवक नहीं शक्ति में मदहोश अकुशल राजा बन गए हैं जो अपने कर्तव्य भूल चुके हैं। 

आज चारों तरफ सिर्फ मतलबी राजनीति है राजनीति कहीं वोट की तो कहीं नोट कि कहीं जात की तो कहीं धर्म की कही क्षेत्र की तो कहीं देश की कहीं प्यार में राजनीति तो कहीं नफरत में राजनीति कहीं दोस्ती में राजनीति तो कहीं दुश्मनी में राजनीति कहीं गांव की तो कहीं शहर की कहीं अपनों की तो कहीं परायों की पर कहीं ना कहीं राजनीति तो हो रही है कहने का तात्पर्य राजनीति शब्द का क्षेत्र जितना व्यापक है उतना ही संकुचित भी तभी तो एक बाप अपने बेटे से निसंकोच यह कहता है बेटा अपने बाप से ही राजनीति कर रहे हो प्रदेश हो या देश गांव हो या शहर घर हो या कार्यकलाप चाय की दुकान हो या पान की बस स्टैंड हो या रेलवे प्लेटफार्म प्रिंट मीडिया हो या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया खबरीलाल हो या वेब की दुनिया इस समय चारों तरफ एक ही शब्द का जिक्र है राजनीति यहां सुनने देखने और महसूस करने के साथ-साथ उठते-बैठते जागते सोते यहां तक कि खाने और पीने में भी राजनीति हैं। 

जातीय क्षेत्र भाषा इत्यादि जब तक सामाजिक व्यवस्था का अंग था तब तक सब ठीक था परंतु अब यह राजनीतिक व्यवस्था का अंग होता जा रहा है तो भाई यह उठक-बैठक क्यों राजनीति ना ही कोई आकाश से उतरी हुई कोई व्यवस्था है और ना ही राजनेता आकाश से उतरी हुई कोई राजदूत यह राजनीति भी अपनी है और राजनेता भी हममें से कोई एक तो फिर एक दूसरे पर दोष कैसा लगाना यह भी तो एक राजनीति हुई ना अब तो आलम यह हो गया है कि जहां भी राजनीतिक अधिक होता है वहां अपने आप भ्रष्टाचार भी मुंह खोल लेता है और यह स्पष्ट कर देता है कि राजनीति और भ्रष्टाचार का चोली-दामन का साथ है जिसे अलग नहीं किया जा सकता। 

भारत में राजनीति और भ्रष्टाचार का इतिहास

भारत में राजनीति और भ्रष्टाचार का इतिहास बहुत पुराना है भारत की आजादी के पूर्व अंग्रेजों ने सुविधाएं प्राप्त करने के लिए भारत के संपन्न लोगों को सुविधा स्वरूप ध्यान देना प्रारंभ किया राजे रजवाड़े और साहूकारों को धन देकर उनसे वो सब प्राप्त कर लेते थे जो उन्हें चाहिए था अंग्रेज भारत के रईसों को धन देकर अपने ही देश के साथ गद्दारी करने के लिए कहा करते थे और रईस ऐसा ही करते थे यह भ्रष्टाचार वहीं से प्रारंभ हुआ और तब से आज तक लगातार चलते हुए फल फूल रहा है। 

बाबरनामा में उल्लेख है कि कैसे मुट्ठी भर बाहरी हमलावर भारत की सड़क से गुजरते थे सड़क के दोनों और लाखों की संख्या में खड़े लोग मूकदर्शक बनकर तमाशा देखते थे बाहरी आक्रमणकारियों ने कहा है कि यह मूकदर्शक बनी भीड़ अगर हमलावरों पर टूट पड़ती तो भारत के हालात आज शायद अलग होते इसी तरह प्लासी की युद्ध की लड़ाई में एक तरफ लाखों की सेना दूसरी तरफ अंग्रेजों के साथ मुट्ठी भर सिपाही पर भारतीय हार गए एक तरफ भारतीयों की 50000 की सेनातो वहीँ दूसरी तरफ अंग्रेजों के 3000 पर अंग्रेज ही जीते भारत फिर गुलाम हुआ जब बख्तियार खिलजी ने नालंदा पर 11 वीं शताब्दी में आक्रमण किया तो क्या हालात थे खिलजी की 100 से भी कम सिपाहियों की फौज ने नालंदा के 10,000 से अधिक भिक्षुओं को भागने पर मजबूर कर दिया नालंदा का विश्व प्रसिद्ध पुस्तकालय वर्षों तक सुलगता रहा। 

ब्रिटिश राज और भ्रष्टाचार

अंग्रेजों ने भारत के राजा महाराजाओं को भ्रष्ट करके भारत को गुलाम बनाया उसके बाद उन्होंने योजनाबद्ध तरीके से भारत में भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया और भ्रष्टाचार को गुलाम बनाए रखने के प्रभावी हथियार की तरह इस्तेमाल किया देश में भ्रष्टाचार भले ही वर्तमान में सबसे बड़ा मुद्दा बना हुआ है लेकिन भ्रष्टाचार ब्रिटिश शासनकाल में ही होने लगा था जो हमारे राजनेता को विरासत में दे गए थे.
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भारत छोड़कर जाते-जाते भी अंग्रेजों की कुटिल बुद्धि ने भारत को और बिगाड़ करने का सोच लिया था इसलिए एक लंबे अरसे से षड्यंत्रपूर्वक इस देश में नफरत फैलाना शुरू कर दिया था धर्मेंद्र गौड़ की पुस्तक में अंग्रेजों का जासूस था उनके द्वारा भारत छोड़ने के नफरत फैलाने का साथ है भारत के विभाजन की आग में झोंकने की कुटी योजना पहले से ही उन्होंने बना रखी थी .

इतनी अधिक अराजकता इस देश में अंग्रेजों के नाम से पहले कभी नहीं थी आमतौर पर भ्रष्टाचार गरीबी भारत में कहीं भी कभी भी देखने को नहीं मिलती थी यदि कहा जाए राजनीति और भ्रष्टाचार अंग्रेजों की देन है तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी.

मुंबई के प्रसिद्ध प्रकाशक शानबाग लेखकों और साहित्यकारों में काफी प्रसिद्ध रहे हैं फोर्ट  में उनकी पुस्तकों की दुकान स्ट्रैंड बुक स्टाल एक ग्रंथ तीर्थ ही बन जाता है अपने देहांत से पहले शानबाग ने भारतीय संपदा और पाठकों पर बड़ा उपकार किया है जब उन्होंने विश्व प्रसिद्ध इतिहासकार एवं चिंता विल डोरा की दुर्लभ एवं लुप्त प्राय पुस्तक के स्कोर इंडिया का पुनूर प्रकाशन किया यह पुस्तक अंग्रेजों द्वारा भारत की लूट ही नहीं बल्कि भारत के प्राचीन संस्कारों विद्या और चरित्र पर इतिहास के सबसे बड़े आक्रमण का तथ्यात्मक वर्णन करती है इसमें उन्होंने लिखा है कि भारत केवल एक ही राष्ट्र नहीं था बल्कि सभ्यता संस्कृति और भाषा में विश्व का मात्र संस्थान था भारत भूमि हमारे दर्शन संस्कृति और सभ्यता की मां कही जा सकती थी विशिष्टता का क्षेत्र नहीं था जिसमें भारत में सर्वोच्च स्थान न हासिल किया हो.

भारत को भ्रष्ट बनाने में अंग्रेजों की अहम भूमिका

स्वतंत्रता प्राप्ति और लाइसेंस परमिट राज्य का उदय: द्वितीय विश्वयुद्ध की तबाही के कारण ब्रिटेन सहित पूरे विश्व में आवश्यक सामानों की भारी कमी पैदा हो गई थी जिससे निपटने के लिए राशनिंग की व्यवस्था शुरू हुई भारत की आजादी के बाद भी भारत की अर्थव्यवस्था राशनिंग लाइसेंस परमिट लालफीताशाही में जकड़ी रही लाइसेंस परमिट राज था तभी लाइसेंस परमिट पाने के लिए व्यापारी और उद्योगपति घूस दिया करते थे.

उदारीकरण और भ्रष्टाचार का खुला खेल: 1991 में भारतीय अर्थव्यवस्था को उदारीकरण एवं वैश्वीकरण की विश्वव्यापी राजनीति अर्थशास्त्र से जोड़ा गया तब तक सोवियत संघ का साम्यवादी महासंघ के रूप में भी खराब हो चुका था पूर्वी यूरोप के अधिकांश देश पूंजीवादी व्यवस्था के अंग बनने की प्रक्रिया में प्रसव पीड़ा में गुजर रहे थे साम्यवादी चीन बाजार उनकी पूंजीवादी औद्योगिकीकरण के रास्ते औद्योगिक विकास का नया मॉडल बन चुका था.

पहले भ्रष्टाचार के लिए परमिट लाइसेंस राज का दूध पिया जाता था पर जब से देश में वैश्वीकरण निजीकरण उदारीकरण विदेशी करण बाजारीकरण एवं विनियमन की नीतियां आई है तब से घोटालों की बाढ़ आ गई है इन्हीं के साथ बाजारवाद भोगवाद विलासिता तथा उपभोक्ता संस्कृति का अभी जबरदस्त हमला शुरू हुआ है और तब से लेकर आज तक राजनीति और भ्रष्टाचार एक ही नजरिए से देखें और समझे जाने लगे हैं.

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