माँँ मुझे माफ कर दे

हमेशा मेरे उठने से पहले चाय का कप मेरी टेबल पर होता है। मेरे लिए चाय के बगैर दिन की शुरुआत ही नहीं होती है।
पर यह क्या आज मेरी नींद आधे घंटे लेट खुली किंतु आश्चर्य की बात तो यह है की आज चाय मेरी टेबल पर नहीं है। फिर क्या था चाय को टेबल पर ना देख मैंने माँँ को जोर से पुकारा "माँँ मेरी चाय कहां है" कोई आवाज नहीं आई मैं गुस्से से उठा और सीधे माँँ को ढूंढने किचन में गया लेकिन माँँ तो यहां भी नहीं थी अब मैं चिल्लाते हुए माँँ के कमरे में गया मैं कमरे के अंदर जाते वक्त गुस्से से कह रहा था। माँँ चाय नहीं दोगी क्या ? पर कमरे के भीतर प्रवेश करते ही मैं आश्चर्यचकित रह गया। मैं देखता हूं माँ को तेज बुखार है वह उठ भी नहीं पा रही पर तब भी माँ धीमी सी आवाज़ से कहती है ला रही थी बेटा यह सुनकर मेरी आंखों में आंसू आ गए। मैंने माँँ को गले से लगाते हुए कहा मुझे माफ कर देना माँँ मैं सुबह से चाय चाय चिल्लाकर गुस्सा कर रहा था मैंने एक बार भी तेरे बारे में नहीं सोचा कि समय-समय पर चाय,खाना,कपड़े देने वाली  मेरी माँँ भी तो एक इंसान है माँँ तू आराम कर मैं पास की मेडिकल स्टोर से जाकर तेरे लिए दवा  लेकर आता हूं और हाँँ आज मैं तुझे अपने हाथ से चाय पिलाऊंगा यह सुनकर माँँ ने अपना मुंह दूसरी तरफ मोड़ लिया मैंने देखा माँँ रो रही है मैंने पूछा माँँ रो क्यों रही हो माँँ ने कहा शायद आज मेरा बेटा बड़ा हो गया। दोस्तों कभी भी अपनी माँँ को मशीन मत समझना वह दिन भर हम सब का ख्याल रखती है इसका मतलब यह नहीं की वह इसके लिए बाध्य है यह उसका निस्वार्थ प्रेम है।
                                           - आशुतोष त्रिपाठी 

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